महापर्व छठ का पहला अर्घ्य आज दिया जाएगा, जानें महत्व

पटना: महापर्व छठ का पहला अर्घ्य आज दिया जाएगा. छठ पूजा में आस्ताचल और उदित सूर्य की पूजा की जाती है. उदित सूर्य नए सवेरा का प्रतीक है. जबकि अस्त होता हुआ सूर्य विश्राम का प्रतीक है. छठ पूजा के पहले दिन अस्त होते हुए सूर्य का अर्घ्य दिया जाता है.

अन्य दिन लोग सुबह उठकर सूर्य को जल चढ़ाते हैं. लेकिन, छठ के मौके पर अस्त होते हुए सूर्य को भी जल चढ़ाया जाता है. अस्त होता हुआ सूर्य इस बात का प्रतीक है कि कल फिर से सुबह होगी और नया दिन आएगा.

अथर्ववेद के अनुसार, षष्ठी देवी भगवान भास्कर की मानस बहन हैं. प्रकृति के छठे अंश से षष्ठी माता उत्पन्न हुई हैं. उन्हें बच्चों की रक्षा करने वाले भगवान विष्णु द्वारा रची माया भी माना जाता है. इसीलिए बच्चे के जन्म के छठे दिन छठी पूजी जाती है, ताकि बच्चे के ग्रह-गोचर शांत हो जाएं. एक अन्य मान्यता के अनुसार कार्तिकेय की शक्ति हैं षष्ठी देवी.

रविवार 11 नवंबर : नहाय-खाय

सोमवार 12 नवंबर : खरना (लोहंडा)

मंगलवार 13 नवंबर : सायंकालीन अर्घ्य

बुधवार 14 नवंबर : प्रात: कालीन अर्घ्य

रविवार 11 नवंबर : नहाय-खाय

चार दिन तक चलने वाले सूर्य उपासना का महापर्व छठ नहाय खाय के साथ शुरू होगा. इस दिन स्नान के बाद घर में दाल-चावल और लौकी (घीया) की सब्जी बनाई जाती है. मान्यताओं के मुताबिक, नहाय-खाय में लौकी की सब्जी को जरूरी माना जाता है.

सोमवार 12 नवंबर : खरना (लोहंडा)

खरना पूजा का दूसरा व सबसे कठिन चरण माना जाता है. इस दिन व्रती निर्जला उपवास रखेंगे और शाम को पूजा के बाद खीर और रोटी का प्रसाद ग्रहण करेंगे. खरना का प्रसाद लेने के लिए आस-पास के सभी लोगों को निमंत्रित किया जाता है. इस दौरान पूरे घर की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है.

मंगलवार 13 नवंबर : सायंकालीन अर्घ्य

इस दिन शाम के सुर्याय्त से पहले सूर्य भगवान को पहला अर्ध्य दिया जाता. यह अर्घ्य ही सूर्य पूजा की शुरुवात है. पानी में खड़े होकर यह अर्घ्य दिया जाता है. शाम को पूरी तैयारी और व्यवस्था कर बांस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रति के साथ परिवार तथा पड़ोस के सारे लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने घाट की ओर चल पड़ते हैं.

बुधवार 14 नवंबर : प्रात:कालीन अर्घ्य

प्रथम अर्घ्य के बाद अगली सुबह का अर्घ्य प्रातः कालीन उदित सूर्य का होता है. प्रथम अर्घ्य और द्वितीय अर्घ्य के बीच का समय ही तप का होता है. जिसमें हम छठ माता को प्रसन्न करते हैं. यह अन्तराल प्रकृति को प्रसन्न करने का तथा उससे वर प्राप्त करने का है कि पुत्र की कामना या संतान की प्राप्ति इतनी आसान नहीं होती.

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